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बिना NOC शिक्षा विभाग के शिक्षकों पर हॉस्टल की जिम्मेदारी! GPM में ‘दोहरी ड्यूटी मॉडल’ प्रदेश में चर्चा का विषय…!”

“बिना NOC शिक्षा विभाग के शिक्षकों पर हॉस्टल की जिम्मेदारी! GPM में ‘दोहरी ड्यूटी मॉडल’ प्रदेश में चर्चा का विषय…!”

“प्रधान पाठक दिन में स्कूल संभाले या हॉस्टल? 30 किलोमीटर दूर अधीक्षक बनाकर शिक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ का आरोप”

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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही।जिले के आदिवासी विकास विभाग और शिक्षा विभाग के बीच समन्वय को लेकर एक नया और बेहद चर्चित मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला जिले में शिक्षकों, प्रधान पाठकों और सहायक शिक्षकों को बिना शिक्षा विभाग की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) के प्रभारी हॉस्टल अधीक्षक की जिम्मेदारी सौंपे जाने से जुड़ा है।

जानकारी के मुताबिक आदिवासी विकास विभाग द्वारा जारी आदेशों में कई शिक्षकों और प्रधान पाठकों को छात्रावास अधीक्षक का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई कर्मचारियों की मूल पदस्थापना और छात्रावास के बीच 25 से 30 किलोमीटर तक की दूरी बताई जा रही है। जबकि शासन की मंशा और प्रशासनिक सुविधा के अनुसार छात्रावास अधीक्षक की नियुक्ति सामान्यतः निकटस्थ संस्था से, लगभग 5 से 10 किलोमीटर के दायरे में किए जाने की बात कही जाती रही है, ताकि अध्यापन कार्य और छात्रावास संचालन दोनों प्रभावित न हों।

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जबकि कई आदेश में NOC भी जिक्र है..?

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अब इस पूरे मामले ने जिले में प्रशासनिक नियमों, अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या किसी अन्य विभाग के कर्मचारी को संबंधित विभाग की सहमति या NOC के बिना दूसरे विभाग में अतिरिक्त जिम्मेदारी देना नियमसम्मत है?

इस मामले में जिला शिक्षा अधिकारी का बयान और भी ज्यादा चौंकाने वाला माना जा रहा है। जिला शिक्षा अधिकारी ने स्पष्ट कहा है कि उनके कार्यकाल में शिक्षा विभाग की ओर से किसी भी शिक्षक या प्रधान पाठक को प्रभारी अधीक्षक बनाए जाने के लिए कोई NOC जारी नहीं किया गया है। DEO के इस बयान के बाद अब पूरा मामला और गंभीर हो गया है।

दूसरी ओर आदिवासी विकास विभाग शायक आयुक्त का पक्ष यह बताया जा रहा है कि प्रभारी अधीक्षकों की नियुक्ति जिला कलेक्टर के अनुमोदन से की गई है, इसलिए अलग से NOC की आवश्यकता नहीं है। लेकिन प्रशासनिक हलकों में अब यही सवाल चर्चा का विषय बन गया है कि क्या केवल कलेक्टर की स्वीकृति के आधार पर किसी दूसरे विभाग के कर्मचारियों को अतिरिक्त दायित्व सौंपा जा सकता है, जबकि उनका मूल विभाग से अनुमति नहीं लिया गया है?

मामले का सबसे संवेदनशील पहलू शिक्षा व्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव माना जा रहा है। जिन स्कूलों से शिक्षकों और प्रधान पाठकों को हॉस्टल अधीक्षक बनाया गया है, वहां पहले से ही शिक्षकों की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उन स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं? यदि नहीं, तो फिर बच्चों की पढ़ाई कौन संभालेगा?

स्थिति तब और अधिक उलझी हुई दिखाई देती है जब किसी प्रधान पाठक को ही छात्रावास अधीक्षक का अतिरिक्त प्रभार दे दिया जाता है। क्योंकि प्रधान पाठक स्वयं एक संस्था का प्रमुख होता है। उसे विद्यालय संचालन, अध्यापन व्यवस्था, प्रशासनिक कार्य, परीक्षा व्यवस्था और विभागीय रिपोर्टिंग जैसी जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। ऐसे में उसी व्यक्ति को दूसरे संस्थान यानी छात्रावास का प्रभारी बना देना व्यवहारिक रूप से कितना संभव है, इस पर अब सवाल उठने लगे हैं।

शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि एक व्यक्ति से दो-दो संस्थाओं का संचालन कराना न केवल प्रशासनिक दबाव बढ़ाता है, बल्कि इससे शिक्षा और छात्रावास दोनों की व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा रहता है। शिक्षक यदि सुबह स्कूल में उपस्थित रहेगा तो छात्रावास की निगरानी कौन करेगा? और यदि छात्रावास के कार्य में व्यस्त रहेगा तो स्कूल में अध्यापन व्यवस्था कैसे चलेगी?

सूत्रों का दावा है कि पहले ऐसे मामलों में शिक्षा विभाग की औपचारिक सहमति ली जाती थी और बिना NOC किसी शिक्षक को अतिरिक्त प्रभार नहीं दिया जाता था। लेकिन अब अधिकारी बदलने के साथ प्रक्रियाएं और नियम भी बदलते दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि जिले में यह मामला तेजी से चर्चा का विषय बन गया है।

अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिक गई हैं कि क्या इस पूरे मामले की जांच होगी? क्या शिक्षा विभाग और आदिवासी विकास विभाग के बीच अधिकार और जिम्मेदारी को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे? और सबसे अहम — क्या छात्रों की पढ़ाई और छात्रावास व्यवस्था को प्रभावित किए बिना इस “दोहरी जिम्मेदारी मॉडल” को चलाना वास्तव में संभव है या नहीं?

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